आशा के बुझते दीपक को पुस्तकालय ने प्रदान की उम्मीद की बाती…रौशन हुआ अंतहीन तिमिर से भरा घर

सारठ। गरीबी एक ऐसी लाचारी है जो उम्मीद के पंख को उगने से पहले ही नष्ट कर देती है। अंतहीन

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सारठ : युवा हौसला के सामने बारिश भी पस्त, मुंशी प्रेमचंद पुस्तकालय का हुआ उदघाटन

है कौन विघ्न ऐसा जग में, जो टिक वीर के नर के मग में ?

खम ठोंक चलता जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड़।

 मानव जब जोर लगाता है तो पत्थर भी पानी बन जाता है।।”

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