विराट एवं बहु-आयामी व्यक्तित्व के धनी बाबासाहेब

बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर महापरिनिर्वाण दिवस पर विशेष

बाबा साहेब का जीवन एक योद्धा का जीवन था, जिसने अभाव, उपेक्षा, घृणा, अर्स्पश्यता, निन्दा तथा घोर विरोध के वातावरण में भी जिनकी वाणी, लेखनी और कदम करोड़ों वंचितों, असहाय लोगो के लिए निरंतर अडिग-अविचलित गतिमान रहे तथा लक्ष्य की और बढ़ते रहे। बाबा साहेब के संघर्ष और बहुआयामी व्यक्तित्व को समझने से पूर्व बाबा साहेब के जीवन चरित का जानना आवश्यक है।

बाबा साहेब का जन्म उस समय अस्पृश्य कहे जाने वाले ‘महार’ परिवार के श्री रामजी सकपाल, जो अंग्रेजी सेना में सिपाही के रूप में भर्ती हुये और अपनी मेहनत और लगन के बल पर सुबेदार मेजर पद पर पहुँचे थे। श्री रामजी सकपाल महाराष्ट्र के रत्नगिरि जिले के अम्बाबाडे नामक गाँव के रहने वाले थे। जब श्री रामजी सकपाल मध्य प्रदेश के इन्दौर जिले की सैनिक छावनी महू में तैनात थे वहीं 14 अप्रैल, 1891 को भीमराव का जन्म हुआ। 1894 में सूबेदार रामजी सकपाल रिटायर होकर बम्बई में रहने लगे, बालक भीम अभी पाँच वर्ष के थे कि माता भीमाबाई का देहान्त हो गया, पिता श्री रामजी सकपाल बालक भी को पढ़ाना चाहते थे, अस्पर्श जाति के कारण स्कुल में बड़े कष्ट से प्रवेश मिला, बालक भीम ने बाल्यकाल से ही अर्स्पश्यता के कटु अनुभव को सहा, कक्षा में सभी छात्रें से दूर बैठना, पानी पीने के लिए घड़े को न छुना और नाई के द्वारा बाल न काटना, कक्षा में आध्यापक द्वारा उत्तर पुस्तिका को हाथ न लगाना।

एक दिन वे अपने पिता से मिलने गोरे गांव गए थे और रेलवे स्टेशन पर जब कोई लेने नहीं आया तो बड़ी मुश्किल से एक बैलगाड़ी गांव जाने के लिए तैयार हुई किन्तु गाड़ीवान को जैसे ही पता चला कि यह बच्चे आनन्दराव, भीम और उनका भान्जा, अछूत महार है तो उसी समय इनको नीचे धकेल दिया गया। इन सैकड़ो घटनाओं ने भीम के मन को झकझोर दिया। कई बार वह अपने पिता और बुआ मीरा बाई से प्रश्न करता था किन्तु कोई सही उत्तर ना पाकर उदास भी हो जाता, किन्तु जहाँ एक ओर समाज व्यवस्था ने चोट पहुँचाई वही दूसरी और हाईस्कुल के शिक्षक ने अपने मेधावी छात्र भीम को अपना उपनाम अम्बेडकर दिया क्योंकि उनके गांव का नाम अम्बावाडेकर था। शिक्षक श्री पेंडसे से उनको स्नेह, प्यार और दुलार मिला। जब पहली बार एक अछुत महार जाति का बालक मैट्रिक पास करता है। उसके अभिनन्दन कार्यक्रम में श्री कृष्ण जी अर्जुन केलुस्कर ने अध्यक्षता की और आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृति मिले इसका भी प्रयास किया ।

भीमराव ने एल्फिस्टन कॉलेज में प्रवेश लिया और 1912 में बी॰ए॰ उत्तीर्ण की। घर की आर्थिक स्थिति ठीक ना होने के कारण बड़ोदा रियासत में लैफटीनैंट की नौकरी की। लेकिन 15 दिन में ही पिताजी का अस्वस्थ की खबर पर बम्बई लौट आना पड़ा। 3 फरवरी 1913 को पिता का देहान्त हो गया। अब भीमराव पर परिवार का बौझ और आगे की पढ़ाई जारी रखने की चुनौती थी और बड़ौदा की रियासत के एक समझौते के तहत जुलाई 1913 को अमेरिका के कोलम्बिया विश्व विद्यालय में दाखिला लिया। भीम उस समय अस्पृश्य जाति का प्रथम छात्र था जो विदेश पढ़ने गया। वहाँ 18-18 घंटे पढ़कर एम॰ए॰ और पी॰एच॰डी॰ की पढ़ाई पूर्ण की और 1916 में अमेरिका से लन्दन एम॰एस॰सी॰ और बी॰एस॰सी॰ की पढ़ाई हेतु गए। किन्तु उनको बीच में ही भारत लौट आना पड़ा और समझोते के तहत बड़ौदा रियासत में नौकरी की, किन्तु वहाँ भी अर्स्पश्यता के डंक ने उनको घायल किया। बड़ौदा रियासत के सैन्य सचिव होने पर भी उनको कोई घर नहीं मिला। पारसी धर्मशाला में पारसी बनकर ठहरे किन्तु पता चलते ही पारसी धर्मशाला से सामान सहित बाहर कर दिया गया और यहीं डा॰ अम्बेडकर के जीवन में एक नया मोड़ आया कि मेरे जैसे शिक्षित व्यक्ति को यदि सम्मान नहीं मिल सकता तो मेरे समाज के करोड़ों बन्धु तो पशु तुल्य जीवन जीने के लिए मजबूर रहेंगे। अब मेरे समाज को इस अस्पृश्यता के कलंक से मुक्ति दिलाना ही मेरे जीवन का लक्ष्य है। मुम्बई आकर सिडेनहम कालेज में 1918 में राजनैतिक अर्थशास्त्र के पद पर कार्य आरम्भ किया। किन्तु नौकरी करते हुये कुछ पैसे बचाये और कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति शाहु जी महाराज की सहायता से पुनः लन्दन अपनी अधुरी पढ़ाई को पूरा करने के लिए गए। लन्दन से एम॰ एस॰सी॰ और लॉ की डिग्री लेकर भारत लौटे। 1923 में भारत लौटने के साथ ही बैरिस्टर बन कर अब उन्होंने समाज की लड़ाई लड़ने का संघर्ष आरम्भ किया और जीवन पर्यन्त 6 दिसम्बर, 1956 तक इस देश के वंचितो, दलितो और महिलाओं के उत्थान और सम्मान की लड़ाई लड़ना आरंभ किया। बाबा साहेब का जीवन विराट और बहुआयामी रहा, किन्तु इस देश का दुर्भाग्य रहा कि गत् 50 वर्षों में बाबा साहेब के व्यक्तित्व के एक-दो पक्षों को ही भारत की जनता के समक्ष रखा गया। आज बाबा साहेब के विराट रूप, बहुआयामी व्यक्तित्व और सर्वस्पर्शी कार्य का वर्णन करने का लघु प्रयास करेंगे।

सामाजिक आन्दोलनकारी

सन् 1923 को लंदन से बेरिस्टर बनकर लौटने पर अपना जीवन उपेक्षित, वंचितों के उद्धार में जुट गये, 20 जुलाई, 1924 को बहिष्कृत हितकारिणी सभा का स्थापना कर सामाजिक जीवन आरंभ किया, इस सभा के माध्यम से देश के वंचितों के लिए संघर्ष आरम्भ किया। सन् 1924 में समता सैनिक दल का गठन किया। सामाजिक क्रांतियों के इतिहास में बाबा साहेब का महाड़ सत्याग्रह एक मील के पत्थर की तरह हैं, महाड़ के चावदार तलाब में पशु तक पानी पी सकते थे किन्तु अर्स्पश लोगों को पानी पीने का अधिकार नहीं था, इसके विरोध में 20 मार्च, 1927 को अपने ही सहयोगियों के साथ चावदार तलाब, महाड़ ने पानी पीकर एक नई क्रांति को जन्म दिया। सन् 1929 में उन्होंने घोषणा कि यज्ञोपवीत पर केवल ब्राह्मणों का ही अधिकार नहीं अपितु सभी हिन्दुओं का समान अधिकार है, इसके साथ ही हज़ारों अस्पर्श बन्धुओं को यज्ञोपवीत करवाया। सन् 1930 में नासिक के कालाराम मन्दिर में प्रवेश हेतु सत्याग्रह किया। और अह्वान किया जितना अधिकार मन्दिर में र्स्पश्यों का है उतना ही अधिकार अर्स्पश कहे जाने वाले बन्धुओं का है। अतः कालाराम मन्दिर का आंदोलन सामाजिक क्रांति का आधार बना।

मजदूर नेता

सन् 1920 के दशक में मिल मजदूरों के बीच कम्यूनिस्ट संगठनों का प्रभाव था, बाबा साहेब कम्यूनिस्टों की हड़तालों से दूर रहने का आग्रह करते थे। और हम मजदूरों की ऐसी स्थिति नहीं है कि हम हड़ताल पर जाकर अपने और अपने परिवार को भुखमरी के कग़ार पर ले जाए। कम्यूनिस्टों को राजनीति से प्रेरित और मजदूरों का घोर शत्रु बताया। सन् 1936 में स्वतंत्र मजदूर दल कि स्थापना की और घोषणा पत्र जारी किया। जिसमें श्रमिकों के लिए कानून बनाया जाए, नौकरियाँ देना, कारखानों में बढ़ती देना, काम के घण्टे, वेतन, छूट्टी, सस्ते आवास आरोग्य आदि सम्बंधित कानून बनाये जायें। सन् 1938 में बम्बई विधान सभा के ओद्यौगिक कलह अधिनियम-1938 पारित हुआ जो मजदूर विरोधी था। बाबा साहेब ने इस विधेयक के खिलाफ 60 मजदूर संगठनों को एकत्रित व संगठित कर आंदोलन का नेतृत्व किया।

लेखक, पत्रकार 

बाबा साहेब के बहुआयामी व्यकि्तत्व में उनकी लेखनी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। सन् 31 जनवरी, 1920 में पाक्षिक मूकनायक पत्रिका आरम्भ की। देश के लाखों – करोड़ों दलितों व वंचितों की आवाज़ मूकनायक बना। सन् 1924 में सामाजिक आंदोलन हेतु बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया, इन संघर्षों को लोगो तक पहुँचाने के लिए सन् 3 अप्रेल, 1927 में बहिष्कृत भारत मराठी पाक्षिक आरंभ किया, सन् 1930 में जनता के सहयोग से भूषण प्रीटिंग प्रेस, बम्बई में स्थापना की और जनता नामक पत्र निकाला, यह पत्रिका 26 वर्षो तक संघर्ष की साक्षी बनी। बाद में इसका नाम प्रबुद्ध भारत रखा गया। बाबा साहेब ने उस काल की प्रत्येक राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय घटना पर वह बेबाकी से विचार प्रकट करते थे। उनके द्वारा लिखी पुस्तकें व लेख आज भी वंचित समाज का मार्ग दर्शन करती है। एवं उनकी कलम ने भारत को श्रेष्ठ संविधान दिया।

अर्थशास्त्री

निःसंदेह बाबा साहेब सामाजिक व राजनैतिक क्रांति के अग्रज थे किन्तु मूलत् वह महान अर्थशास्त्री थे। उनकी एम॰ए॰, एम॰फिल॰, पी॰एच॰डी॰, एम॰एस॰सी॰, डी॰एस॰सी॰ सभी विषयों के शोध प्रबंध अर्थनीति, अर्थशास्त्र और अर्थव्यस्था से संबंधित थे। इनके शोध प्रबंध

  • Administration and Finance of East India Company.
  • Small Holdings in India and their remedies.
  • Evolution of Provincial Finance in British india.
  • Problem of Rupee.

दामोदर वैली बिल 1948 में पारित, इस प्रोजेक्ट के शिल्पकार थे। कृषि क्षेत्र में अमूल्य सुझाव, खेती का राष्ट्रीकरण, सामूहिक व सहकारी खेती, खेती में खोत पद्धति का उन्मूलन, खाद, बीज और सिंचाई सरकार की और से बजट में खेती के अधिक राशि, निजी साहुकारों पर नियत्रंण। नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री डा॰ अमर्त्य सेन ने डा॰ अम्बेडकर को पिता तुल्य माना। देश का विकास औधोगीकरण से होगा इसका भी महत्व बताया। आर बी आई, योजना आयोग की स्थापना उनके शोध प्रबंधो के आधार पर हुई।

श्रम मन्त्री

बाबा साहेब अम्बेडकर 1942-1946 के काल में वासराय की काउंसिल में श्रम मंत्री के रूप् में कार्य किया। श्रम मंत्री के रूप् में उन्होंने मजदूर तथा मालिकों को मिलाकर औद्योगिक क्षेत्र के लिए नई-नई नीतियां स्थापित कीं। इनमें से प्रमुख हैं- मजदूरों का न्यूनतम वेतन, काम के घण्टे, मजदूरों की भविष्य निधि, सस्ते मूल्य के अनाज की व्यवस्था, कारखानों में जलपान गृह, विश्राम आदि एवं श्रम मंत्री के नाते बाबासाहेब ने जो कार्य किया, दुर्भाग्य से उसका योग्य मूल्यांकन नहीं हो सका। महिलाओं के लिए भी उन्होंने अनेक सुविधाएँ यथा मातृत्व अवकाश के रूप् में अवकाश देने का प्रावधान रखा। बाबासाहेब ने 1928 के मेटेरनिटी बेनिफिट बिल के पक्ष में विचार रखे।

आज भी बाबासाहेब के विचार व कार्य मजदूरों के बीच में तथा पूरे संगठित क्षेत्र एवं असंगठित क्षेत्र में सभी के लिए प्रासंगिक हैं। उस परिप्रेक्ष्य में हम आज की परिस्थितियों से कैसा तादात्म्य बैठा सकते हैं, यह विचार का विषय है।

संविधान रचयिता

30 अगस्त, 1947 को डा॰ अम्बेडकर को संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष चुना गया। प्रारूप् समिति के सात सदस्य थे। जिन्में एक का देहांत हो गया, एक विदेश चले गये, एक व्यक्ति ने त्याग पत्र दे दिया, दो व्यक्ति दिल्ली से दूर और अस्वस्थ थे। अतः अन्ततः संविधान का प्रारूप तैयार करने का सारा दायित्व डा॰ अम्बेडकर पर आ पड़ा। 26 नवम्बर, 1949 संविधान को तैयार कर संविधान सभा को सौंपा गया एवं इसी सभा के माध्यम से राष्ट्र को समर्पित किया।

विधि मंत्री

बाबा साहेब विधि मंत्री के रूप में हिन्दु कोड बिल के शिल्पकार थे। हिन्दु कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को समान अधिकार व सम्मान मिले इसके वह प्रबल समर्थक थे। हिन्दु कोड बिल में विधवा को पुनर्विवाह, मृतक पति की सम्पति में अधिकार, नारी मुक्ति का अधिकार, गोद लेने का अधिकार आदि का प्रावधान रखा। हिन्दु कोड बिल में सभी हिन्दु-सिख, बौद्ध, जैन आदि विभिन्न भारतीय मूल के सभी सम्प्रदाय सम्मलित किए और इस बिल के संसद में पारित न होने की स्थिति में 1951 में विधि मंत्री पद से इस्तीफा दिया। इस्तीफा देते वक्त कहा कि ‘हिन्दु कोड बिल में लिए संविधान बनाने से भी अधिक महत्वपूर्ण है’।

बोद्धिसत्व

बाबा साहेब ने 1935 में घोषण कि ‘‘दुर्भाग्य से मैं अस्पृश्य जाति में जन्मा हुँ, यह मेरा कोई अपराध नहीं, फिर भी मैं हिन्दु के रूप में नहीं मरूगाँ’’ और कहते हुए बौद्ध धर्म अंगीकार किया। सन् 1935 की यह घोषणा जाति व्यवस्था की समाप्ति पर अंतिम कड़ा प्रहार किया। विभिन्न मत सम्प्रदायों द्वारा प्रभोलन मिला किन्तु 21 साल बाद 14 अक्टुबर, 1956 नागपुर में बौद्ध धर्म दीक्षा ग्रहण की जिसकी जड़ें, दर्शन और आत्मा भारत में बसती है। बौद्ध भिक्षु, महास्यविर चन्द्रमणि जी महाराज ने घोषणा की बौद्ध और हिन्दु एक वृक्ष की शाखाएं हैं। संविधान में ‘स्वतंत्रता, समता और बन्धुत्व’’ का विचार तथागत बुद्ध से प्रेरित है। तथागत बुद्ध के केन्द्रबिन्दु में धम्म है, बाबा साहेब भी धम्म को भारतीय दर्शन की आत्मा मानते थे।

राष्ट्र चिंतक

बाबा साहेब का सम्पूर्ण जीवन देश के वंचितो एवं दलितों के लिए समर्पित था। उनका मानना था कि महिलाओं के विकास के बिना विकास अपूर्ण है। अपने जीवन के आरंभ से लेकर अन्त तक हम भारतीय हैं इस भाव को जागृत रखा। जहाँ एक और बिट्रिश सरकार से अर्स्पश्यों के लिए समान अधिकार व शिक्षा की मांग करते थे वहीं दूसरी और बिट्रिश आर्थिक शोषण को अपने शोध ग्रन्थो में स्पष्ट किया। समानता के बिना स्वतन्त्रता निरर्थक है, समानता, स्वतन्त्रता और बन्धुत्व का विचार उनके बौद्ध दर्शन का परिचायक है। इस दर्शन के बिना समाज में समरस्ता नहीं होगी इस पर उनका दृढ़मत रहा। संविधान के रूप में भारत को अनुपम भेंट देकर भारत को एकीकृत, संगठित राष्ट्र बनाने में उनका अतुलनीय योगदान आज भी प्रासंगीक है। भाषाओं के आधार पर राज्यों के निर्माण के विरोधी थे एवं देश की अखण्डता के लिए वह 370 धारा को घातक मानते थे। हैदराबाद में सेना भेजने का स्वागत किया। बाबा साहेब का जीवन, दर्शन और कृतित्व में राष्ट्रीय निष्ठा में सर्वोच्च स्थान था।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय में राजनीतिक शास्त्र के प्राध्यापक हैं।)