मोतिहारी : पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि पर स्मरणांजलि कार्यक्रम का आयोजन

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महात्मा गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी में आयोजित पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मरणांजलि कार्यक्रम को संबोधित करते विश्वविद्यालय के संगणात्मक विज्ञान, संचार एवं सूचना एवं प्रौद्योगिकी संकाय के अधिष्ठाता एवं मीडिया अध्ययन विभाग के अध्यक्ष अरुण भगत तथा मंचासीन वाणिज्य एवं प्रबंध संकाय के अधिष्ठाता प्रो. पवनेश कुमार, मीडिया अध्ययन विभाग के सह प्राध्यापक प्रशांत कुमार और अंजनी कुमार झा

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय मोतिहारी के मीडिया अध्ययन विभाग एवं जनसंपर्क प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वावधान में एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की 52 वीं पुण्यतिथि के पावन स्मरण पर स्मरणांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के जिला स्कूल स्थित पंडित राजकुमार शुक्ल सभागार में किया गया।

कार्यक्रम में प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर पवनेश कुमार ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक नई विचारधारा को जन्म दिया, जिसे एकात्म मानवदर्शन कहते हैं। इनके दर्शन में स्वदेशी भी समाहित है। इनके विचार को प्रेरणा स्रोत बनाकर ही 370 धारा समाप्त की गई। हमें पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के व्यक्तित्व से सीखने का अवसर मिलता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने गांधी जी के विचारों को आगे बढ़ाया। इनकी सोच राष्ट्रवादी थी। दीनदयाल उपाध्याय जी हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति तक के बारे में सोचते थे। 

कार्यक्रम में मीडिया अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अंजनी कुमार झा ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी मानवतावाद नहीं बल्कि मानव दर्शन के प्रणेता थे।  पंडित जी ने  सभी के कल्याण के प्रबल समर्थक थे। दीनदयाल उपाध्याय जी सभी मानव के समान विकास पर ध्यान देने का कार्य किए। उन्होंने जातिविहीन समाज को स्वीकार किया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी अपने कैरियर की शुरुआत पत्रकारिता से किए और सदैव निष्पक्ष पत्रकारिता की जो पीत पत्रकारिता से परे थी। पंडित जी पत्रकारिता के दौरान कभी भी असामाजिक और अराष्ट्रीय टिप्पणी  नहीं की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे  मीडिया अध्ययन विभाग के अध्यक्ष एवं अधिष्ठाता प्रोफेसर अरुण कुमार भगत ने अध्यक्षीय उद्बोधन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के  दर्शन पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी सामाजिक जीवन की व्यवस्था को चलाने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संकल्पना भी की। पंडित जी कहते हैं की भारत में पूर्व से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक एकात्मता का दर्शन होती है।  भारत की अस्मिता एक है। भारत की विशालता में एकता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की दृष्टि में भारत सांस्कृतिक अधिष्ठान पर खड़ा है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में भारत दूसरे राष्ट्र के लिए कभी खतरा नहीं बनता। भारत भूमि मिट्टी का लोथ मात्र नहीं है बल्कि इस पावन भूमि को मां भारती के रूप में मानते हैं, कल्पना करते हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की संकल्पना में एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के लिए खतरा उत्पन्न नहीं करता। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के साथी अटल बिहारी वाजपेयी जी कहते थे कि यह भूमि ऋषियों की भूमि है, संत-महात्माओं की भूमि है। कृषक की भूमि है। यहां का कण-कण प्यारा है जन-जन दुलारा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के दृष्टि में स्वदेशी को युवानुकूल होना चाहिए और विदेशी को स्वदेशानुकूल होना चाहिए।

समाज जीवन की व्यवस्था को चलाने के लिए समय-समय पर विश्व में अनेक विचारधारा उत्पन्न हुई, यह तमाम विचारधारा किसी न किसी प्रतिक्रिया से उत्पन्न हुई। लोकतंत्र का उदय भी साम्राज्यवाद से परेशान होकर हुई। लेकिन पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानव दर्शन किसी प्रतिक्रिया से उत्पन्न नहीं है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का दर्शन किसी विचार से नहीं बल्कि भारत की सनातन परंपरा से उत्पन्न हुई है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी कहते हैं कि व्यक्ति परिवार से जुड़ा होता है परिवार समाज से और समाज राष्ट्र से और फिर राष्ट्र सृष्टि से। इस प्रकार सभी एक दूसरे से जुड़ा है, यही मानवदर्शन है। पश्चिम ने मनुष्य की आत्मा पर विचार नहीं किया पश्चिम में इसलिए शांति का अभाव है। प्रोफेसर अरुण कुमार भगत ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की पुण्यतिथि पर उनके विचारों को स्मरण करने की आवश्यकता है।

 धन्यवाद ज्ञापन मीडिया अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ प्रशांत कुमार ने दिया। कार्यक्रम का संचालन मीडिया अध्ययन विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. परमात्मा कुमार मिश्र थे। कार्यक्रम में मीडिया अध्ययन विभाग के प्राध्यापक डॉ. साकेत रमण, डॉ. सुनील दीपक घोडके, डॉ. उमा यादव सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभाग के प्रोफेसर, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं मौजूद थे।