भारत से जुड़ा है ज्ञान परंपरा : जे. नंदकुमार

महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन विभाग एवं शिक्षा अध्ययन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में जिला स्कूल, चाणक्य परिसर स्थित राजकुमार शुक्ल सभागार में कल (बुधवार,19 फरवरी 2020 को) एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन मां सरस्वती के मूर्ति पर माल्यार्पण कर एवं दीप प्रज्वलन कर किया गया। यह एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “भारत की शिक्षा व्यवस्था: कल आज और कल” विषय पर केंद्रित थी।


स्वागत वक्तव्य एवं विषय प्रवर्तन करते हुए मीडिया अध्ययन विभाग के अधिष्ठाता एवं अध्यक्ष प्रो. अरुण कुमार भगत ने कहा की आज हमारे बीच राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षाविद है, आज इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में शिक्षा के विभिन्न आयामों पर विचार मंथन होगा। वस्तुतः शिक्षा चेतना का उत्सव है, शिक्षा आनंद देने वाला होता है। आगे उन्होंने कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो भारतीयता और भारत बोध के अनुकूल हो।
विशिष्ट अतिथि के तौर पर छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर की कुलपति प्रो. नीलिमा गुप्ता ने कही कि भारत एक ऐसा देश है जो किसी समय गुरुकुल पद्धति के नाम से जाना जाता था, हमें चर्चा करने की जरूरत है कि आज की शिक्षा किस ओर जा रही है। आज हम डिग्री लेकर मार्केट में भटकते नजर आते हैं। शिक्षा में अभिभावक का भी बड़ा रोल है। हमें बच्चों के रुचि और क्षमता के अनुरूप शिक्षा देनी चाहिए। हमें शिक्षा में शोध की भी बात करनी चाहिए, इसके लिए हमें शिक्षा में नवीनता के ऊपर थोड़ा ध्यान देना होगा। हमें शिक्षा प्राप्ति के साथ साथ एक अच्छा नागरिक भी बनना है और अपने राष्ट्र, देश और विश्वविद्यालय के प्रति भी सोचना है। हमें देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने की ललक भी होनी चाहिए।
अंत में उन्होंने सभी विद्यार्थियों से कहा कि शिक्षा रोजगार के लिए नहीं बल्कि व्यक्तित्व विकास के लिए हो। एक व्यक्ति मर सकता है लेकिन व्यक्तित्व नहीं।

भगत फूलसिंह महिला विश्वविद्यालय, हरियाणा की कुलपति प्रो. सुषमा यादव ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा में आत्मबल होता है। शिक्षा पहले संपूर्ण समाज के विकास के लिए था। विदुर नीति में भी शिक्षा पर बल दिया गया है। अब शिक्षा में से विद्या समाप्त हो गई है शिक्षा सिर्फ रोजगार का माध्यम बन गया है। शिक्षा की दशा एवं दिशा बदलने की आवश्यकता है। शिक्षा से व्यक्ति के अंदर के गुण को निखारा जाता है। शिक्षा हमारे समाज, प्रकृति और जीवन के साथ जुड़ी होनी चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए ताकि शिक्षा के बाद याचना की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

वहीं मुख्य अतिथि के तौर पर ख्यात लेखक एवं शिक्षाविद जे. नंदकुमार ने कहा कि भारत में भाषा की शिक्षा की परंपरा रही है। भारत का नाम ज्ञान से जुड़ा है। अगर शिक्षा के बारे में सोचना है तो भारत से सोचना होगा। हमारे परंपरा में किसी चीज के नाम देने में भी शिक्षा है। उन्होंने संस्कृत के महत्व पर भी चर्चा किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा में टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया जा रहा है, यह अच्छी बात है लेकिन शिक्षा के लिए टेक्नोलॉजी पर आधारित नहीं रहना चाहिए। हमें गौतम बुद्ध और गांधीजी के शिक्षा के विचारों पर भी चिंतन करना चाहिए। अंत में उन्होंने कहा कि शिक्षा ऐसी हो जिससे अच्छे मनुष्य का निर्माण हो सके।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा की बात करते समय शिक्षा और विद्या को साथ साथ चलने की आवश्यकता है। विद्या के साथ अविद्या को भी पहचानने की आवश्यकता है। विद्या किसे दी जाए इस बात पर भी चिंता करनी चाहिए। विद्या जिसे शोभती हो उसे देना चाहिए। आगे उन्होंने समाज जीवन में शिक्षा के महत्व पर भी प्रकाश डाला।
दूसरा सत्र तकनीकी सत्र का हुआ, जिसमें विभिन्न विभागों के शोधार्थी द्वारा शोध पत्रों की प्रस्तुति की गई। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता कर रहे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई के कुलपति प्रो. राममोहन पाठक ने अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षा का जरिया संवाद एवं संचार रहा है। शिक्षा किताबों से ज्यादा अनुभव और अनुभूति से होता है। हमारे प्रथम शिक्षक माता-पिता होते हैं। पौराणिक परंपरा में गुरु के पास जाकर शिक्षार्जन किया जाता था। चाक्षुक ज्ञान भौतिक ज्ञान है। शिक्षा से बहुलतावादी समाज में अपने को सर्वमान्य बनाया जा सकता है। उन्होंने सभी विद्यार्थियों को मूलमंत्र देते हुए कहा कि स्वाध्याय करें। स्वाध्याय शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए उपयोगी है।

मुख्य वक्ता के तौर पर महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के अधिष्ठाता प्रो. आशीष श्रीवास्तव ने कहा कि शिक्षा व्यवसाय को बुरा कहना आसान है पर बुराई खोजना मुश्किल। उन्होंने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को 3 भागों में बांट कर कहा कि मुगलों के आने से पहले की शिक्षा व्यवस्था “कल” है। मुगल के बाद और आज तक की शिक्षा व्यवस्था “आज” है। और आज के बाद भारतीय शिक्षा व्यवस्था में कोई बदलाव होता है तो यह “कल” है।
शिक्षा अध्ययन विभाग के सह आचार्य डॉ मुकेश कुमार ने कहा कि भारत में सांस्कृतिक क्रांतियों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया। शिक्षा के माध्यम से नैतिक चरित्र का निर्माण होना चाहिए। वैदिक कालीन शिक्षा व्यवस्था पर भी चिंतन करना आवश्यक है।
समापन समारोह के मुख्य वक्ता के तौर पर महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व प्रतिकुलपति प्रो. चितरंजन मिश्र ने कहा कि शिक्षा किसी भी समाज को बेहतर बनाने के लिए जरूरी उपक्रम है। शिक्षा हमें संस्कारित करती है। शिक्षा हमें सभी बंधनों से मुक्त करती है। शिक्षा हमारे पूरे सामाजिक संरचना की रचना कराती है। शिक्षा हमें सत्य के साथ जोड़ती है।
समापन समारोह के अध्यक्षीय उद्बोधन में छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. आनंद प्रकाश ने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है। शिक्षा महंगी होती जा रही है, शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने पर विचार करना होगा। आज हमें बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार भी देना होगा। शिक्षा व्यवस्था के जड़ों को पहले मजबूत करने की आवश्यकता है।

अंत में पूरे कार्यक्रम के सफल संचालन के लिए सभी अतिथियों, शिक्षकों, छात्र-छात्राओं एवं अप्रत्यक्ष रुप से सहयोग करने वाले विश्वविद्यालय कर्मी को धन्यवाद ज्ञापन राष्ट्रीय संगोष्ठी संयोजक मीडिया अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ प्रशांत कुमार ने दिया।

कार्यक्रम में मीडिया अध्ययन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अंजनी कुमार झा, डॉ साकेत रमन, डॉ उमा यादव, डॉ सुनील घोड़के, डॉ परमात्मा मिश्र, डॉ मनीषा कुमारी, डॉ श्याम कुमार झा, शोधार्थी नवीन कुमार तिवारी, मनु कौशिक, रंजन कुमार, आलोकिता विशाल, चिन्मय दास, अंतत सर्वानंद सहित अन्य विभागों के शोधार्थी एवं छात्र छात्राएं थें।