जानें महाशिवरात्रि का महात्मय….

नीतेश झा 21st February 2020

भगवान शिव को अगर श्रद्धापूर्वक याद किया जाए तो अष्ट सिद्धियां प्राप्त करने में  किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न नहीं होता। आज पूरे देश में महाशिवरात्रि का धूम है,भक्त शिवलिंग पर श्रद्धा का जल और आस्था का पुष्प चढ़ाकर भोलेनाथ से अपनी मनोकामना को पूर्ण करने का वर मांग रहे हैं। भगवान शिव के द्वादश ज्योतिरलिंग की पूजा विशेष फलदायी होता है। इन शिवलिंगों की अलग अलग मंत्रशक्ति को जाग्रत करने के लिए सर्वप्रथम शिवलिंग का षोडशोपचार से पूजन कर मंत्र जाप करना चाहिए। यह साधना शिव कल्प के अतिरिक्त किसी भी प्रदोष से मुक्ति का एकमेव रास्ता है।

 

यूं कहें तो शिवरात्रि हर महीने में आती है लेकिन महाशिवरात्री साल में एक बार आती है। अमावास्या के एक दिन या दो दिन पहले जो त्रयोदशी या चतुर्दशी की रात होती है, उसे प्रत्येक माह में माना जाता है परंतु महाशिवरात्रि वर्ष में एक बार मनाया जाता है जिसके कई कारण हैं। महाशिवरात्रि ऐसे समय में में आता है, जब सर्दी का मौसम जाने वाला होता है और गर्मी का मौसम शुरू होने वाला होता है। सीधे सीधे कहें तो मौसम अपना रुख बदल रहा होता है। इतना ही नहीं महाशिवरात्रि सूर्य के उत्तरायण होने के बाद आती है ।

महाशिवरात्रि का महत्व चंद्र से भी जुड़ा हुआ है। किवदंतियां है कि भोलेनाथ की उपासना करके ही चंद्र को उस शाप से मुक्ति मिली थी, जो उन्हें दक्ष प्रजापति से मिला था। शाप की वजह से चंद्र अमावस्या के दिन ही मरने वाले थे लेकिन उन्होंने भोलेनाथ की प्रार्थना शुक्ल पक्ष में की और वे बच गए। इसलिए भोलेनाथ के बारे में कहते हैं कि भोलेनाथ हमारी जिंदगी के कृष्ण पक्ष यानी दुखी संसार को शुक्ल पक्ष में बदल देते हैं। इसलिए हर महीने अमावस्या के एक-दो दिन पहले शिवरात्रि की पूजा करते हैं।

महाशिवरात्रि के साथ कुछ और खास बाते हैं। महाशिवरात्रि के समय न केवल कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष में पहुंचते हैं, बल्कि ऋतु भी बदलती है। इस तरह हम कह सकते हैं कि महीने का ही नहीं, बल्कि नए साल का शुक्ल पक्ष भी शुरू होता है।

मान्यता है कि महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था। ऐसा शिवलिंग जिसका न तो आदि था और न ही अंत। कहते हैं कि ऐसे भव्य शिवलिंग को देखने से ब्रह्मा और विष्णु भी खुद को रोक नहीं पाए थे। ब्रह्मा जी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए। दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला।
यह भी कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन ही शिवलिंग विभिन्न 64 जगहों पर प्रकट हुए थे। उनमें से हमें केवल 12 जगह का नाम पता है। इन्हें हम द्वादश ज्योतिरलिंग कहते हैं। महाशिवरात्रि के दिन बैद्यनाथधाम, देवघर मंदिर में विशेष आयोजन होता है, एक दिन पूर्व पंचशूल को उतार कर विशेष पूजा किया जाता है, आपको बता दें कि पंचशूल सिर्फ बैद्यनाथधाम मंदिर के शिखा पर विराजमान है किसी अन्य द्वादश ज्योतिर लिंग मंदिर में नहीं। देवघर की भव्य शिवबारात में देश विदेश के लोग शामिल होते है।
महाशिवरात्रि को पूरी रात लोग जागरण करते हैं। शिवलिंग पर बेलपत्र और दूध चढ़ाते हैं। भावविभोर होकर लोग शिवजी की शादी का उत्सव मना रहे होते हैं। महाशिवरात्रि को शिवजी के साथ शक्ति की शादी हुई थी। इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। शिव जो वैरागी थी, वह गृहस्थ बन गए। माना जाता है कि शिवरात्रि के 15 दिन पश्चात होली का त्योहार मनाने के पीछे एक कारण यह भी है।