‘जम्मू-कश्मीर का बदलना होगा विमर्श’ – आशुतोष मिश्र

22nd December 2017
आशुतोष मिश्रा

जम्मू-कश्मीर में व्याप्त समस्या देश के भूभाग का नहीं, बल्कि देश की अस्मिता का प्रश्न है। हमें इस समस्या से निपटने के लिए कुछ तत्वों की ओर से प्रायोजित मुद्दों से बाहर निकलकर तथ्यों पर बात करने की आवश्यकता है। देश के इस मुकुट राज्य में जो समस्याएं विद्यमान हैं, वह श्रीनगर की नहीं, बल्कि दिल्ली की देन हैं।

आज के दिन जम्मू-कश्मीर कोई समस्या नहीं है। बल्कि हमारी सरकारों की कुछ देन है कि वहां के बारे में कुछ गलत विषय पूरी दुनिया भर में चल रहे है। 26 अक्टूबर 1947 को हुए कश्मीर के विलय को संयुक्त राष्ट्र से भी मान्यता मिल चुकी है, ऐसे स्थिति में भी जम्मू-कश्मीर को विवादित कहना गलत है। विवाद है तो गिलगित-बल्तिस्तान और मुजफ्फराबाद आदि पीओजेके के इलाकों का है, जो पाक के कब्जे में है। जम्मू-कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य राज्य नहीं है। 52 फीसदी गैर हिंदू लोगों की आबादी है।

फिर भी आज की यह स्थिति यह है कि हमें अपने देश के इस प्रांत के कब्जे वाले हिस्से (जो आज पाकिस्तान के कब्जे में है) के बारे में जो भी जानकारी मिलती भी है वो सिर्फ पश्चिमी मीडिया के जरिए मिलती है। पाक के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर का ये हिस्सा गिलगित-बल्तिस्तान का रणनीतिक और सामरिक महत्व आज भी पूरी दुनिया में सबसे ऊपर है। फिर भी यह हमारी चूक है कि हम आज भी वहां के लोगों की बात को नहीं सुन पा रहे हैं। जम्मू कश्मीर राज्य कभी दुनिया के सबसे प्राचीन सिल्क रूट का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन आज इसका अधिकांश भाग पाकिस्तान और चीन के अवैध कब्जे में है। ये राज्य हमेशा से भारत की सांस्कृतिक एकता का अभिन्न अंग थे,  इसलिए ही कभी इस राज्य को देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शारदापीठ के नाम से जाना जाता था।

जम्मू-कश्मीर के पूरे मसले को सकारात्मक तरीके से देखा जाना चाहिये क्योंकि कुछ लोग इसे अनुच्छेद 370 तक ही समेट देना चाहते हैं। लेकिन यह अनुच्छेद अस्थायी प्रबंध है और इसे अल्पकाल के लिए ही लागू किया गया था। देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू को धारा 370 के बारे में पत्र लिखा था और डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी नेहरू पर जम्मू-कश्मीर के मामले में अस्पष्ट नीति अपनाने का आरोप लगाया था। फिर भी धारा 35 ए की आड़ लेकर 370 को और अधिक मजबूती दी गई है। और अनुच्छेद 370 की मूल भावना के साथ भी खिलवाड़ किया गया। यहां तक कि 35 ए को संविधान में जोड़ने के लिए संसद की मंजूरी तक नहीं ली गई। ऐसे में इसकी वैधानिकता पर सवाल खड़े होते हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने व्यक्तिगत अहं के कारण ही इस समस्या को और बढ़ा दिया। किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह देश की सुरक्षा के लिए सीमाओं का पूरा ख्याल रखे, लेकिन आजादी के बाद जिन्हें सत्ता मिली, उन्होंने इस बात का ख्याल नहीं रखा। हालांकि अंग्रेज इस बारे में जागरूक थे और उन्होंने रूस, अफगान और चीन आदि के खतरे से निपटने के लिए गिलगित-बाल्टिस्तान में अपनी सेना तैनात की थी। इसके लिए उन्होंने महाराजा हरीसिंह से समझौता भी किया था।

कुछ लोग कश्मीर में व्याप्त मामूली समस्याओं को तूल देकर और अलगाववाद को बढ़ावा देकर इसे लड़ाई का मैदान बना देना चाहते हैं। हमें इससे बचने की आवश्यकता है। क्योकि पूरे देश कश्मीर के मसले पर छह दशकों से जिस रास्ते पर चले हैं, उसमें कोई सफलता नहीं मिली है। आज भी जम्मू-कश्मीर के मामले में सूचना के अभाव से महत्वपूर्ण विषय है, संवाद का अभाव। 370 की वजह से स्थानीय लोगों के बाहर निकलने पर अधिकारों से वंचित रहने और पिछड़े महिलाओं को इससे कोई लाभ नहीं मिला है। पंचायती राज सुधार भी यहां लागू नहीं है। जम्मू-कश्मीर को देश से जोड़ने के लिए सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग और अन्य संस्थाओं के लिए इस राज्य के दरवाजे खोलने होंगे। इसलिए हमें अब वर्तमान समय में विभिन्न नए आयामों के तहत इस विषय के बारे में विमर्श करने की जरूरत है।

(लेखक  जम्म कश्मीर अध्ययन केन्द्र से जुड़े हैं , पूर्वोत्तर एवं जम्मू – कश्मीर पर इनका गहरा अध्ययन  है।)

नोट – उपरोक्त वर्णित तथ्य लेखक के निजी विचार हैं।