चारे पर नहीं चला लालू का चारा… – अजीत कुमार सिंह

23rd December 2017

बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाले मामले में अदालत ने अपना फैसला सुना दिया है। इस फैसले में केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की विशेष अदालत ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमों सह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव समेत 16 लोगों को दोषी करार दिया है। अदालत के इस फैसले से यह साबित हो गया कि न्याय में देर है मगर अंधेर नहीं…। अदालत के इस फैसले से बिहार की राजनीति पर भी व्यापक असर पड़ने वाला है। हांलाकि लालू यादव को इसका अंदेशा पहले से था तभी तो उन्होंने राजद की कमान धीरे – धीरे अपने बेटे तेजस्वी को सौंपने लगे थे। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक लालू के जेल जाने से उनकी पार्टी में बगावत भी हो सकती है। लालू के जेल जाने के बाद नेताओं को एकजुट रख पाना उनके दोनों बेटों तेजस्वी यादव और तेज प्रताप के लिए बड़ी चुनौती होगी। जगन्नाथ मिश्रा के बरी होने की खबर के बाद  लालू आश्वस्त थे कि उऩ्हें भी बरी कर दिया जायेगा, लेकिन अदालत के फैसले से मायूसी छा गई। अदालत ने चारा मामले में लालू समेत पंद्रह आरोपियों को दोषी करार दिया है जिसकी सजा तीन जनवरी 2018 को सुनाई जायेगी। राजनीतिक के धुरंधर माने जाने वाले लालू यादव का चारे मामले में अदालत के सामने कोई चारा नहीं चला।

जानें कब क्या हुआ –

क्या है मामला

साल 1990 से 1994 के दरम्यान देवघर कोषागार से पशु चारे के नाम पर अवैध ढंग से 89 लाख, 27 हजार रुपये निकालने का आरोप है।  इस दौरान लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे। हांलाकि चारा घोटाला मामला सरकार के खजाने से 900 करोड़ रूपये के हेरफेर का है, जिनमें से एक देवघर कोषागार से जुड़ा मुकदमा है। चारा घोटाला का मुकदमा 20 साल से चल रहा है। मामले की गहराई में जाकर गर बात करें तो चारा घोटाले में सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव व डॉ जगन्नाथ मिश्र सहित 55 आरोपियों के खिलाफ 23 जून 1997 को चार्जशीट दाखिल की थी। पशुपालन विभाग के अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से इस घोटाले को अंजाम दिया गया था। इसमें पशुओं के लिए चारे, दवाई आदि के लिए सरकारी खजाने से पैसा निकाला गया था।

23 जून 1997 को दाखिल हुआ था चार्जशीट

बिहार पुलिस ने 1994 में राज्य के  गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जैसे कई कोषागारों से अवैध भुगतान रसीद के जरिए करोड़ों रूपये की कथित अवैध निकासी के मामले दर्ज किये। मामला दर्ज होने के बाद रातों – रात सरकारी कोषागार और पशुपालन विभाग के सैंकड़ो कर्मचारी गिरफ्तार किये गये और राज्य भर में दर्जन भर आपराधिक मुकदमें दर्ज किये गए, मामला यहीं पर नहीं रूका और राज्य के विपक्षी दलों ने मामले की जांच सीबीआई से करवाने की मांग कर डाली और सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश दिये। सीबीआई ने मामले के जांच की कमान निदेशक यूएन विश्वास को सौंपी और  यहीं से जांच का रूख बदल गया।

व्यापक षडयंत्र का मामला है चारा घोटाला

सीबीआई की मानें तो यह कोई छोटा – मोटा समान्य आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला नहीं बल्कि व्यापक षड़यंत्र का मामला है, जिसमें राज्य के कर्मचारी, नेता और व्यापारी वर्ग समान रूप से भागीदार थे। मामले की आंच बिहार के एक पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र तक पहुंची और उन्हें भी गिरफ्तार किया गया। राज्य के कई और मंत्री भी गिरफ्तार किये गये।

राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है असर

लालू का जनाधार भले ही बिहार तक सीमित हो, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में वह अहम भूमिका निभाते रहे हैं। यूपीए सरकार में रेल मंत्री रहे राजद सुप्रीमो कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहे हैं और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के नाम पर विभिन्न दलों को एकजुट करने की कई बार कोशिश कर चुके हैं। लालू का इरादा 2019 से पहले गैर – भाजपाई दलों को एक मंच पर लाकर मोदी के लिए कड़ी चुनौती पेश करने की थी लेकिन अब लगता है उनकी यह तमन्ना अधर में लटक गया।

इस फैसले पर देश भर की निगाहें लगी हुई थी, चूंकि चारा घोटाले को देश के चर्चित घोटाले में गिनती की जाती है। चारे घोटाले के कारण लालू यादव को कई बार जेल भी जाना पड़ा था। लालू के जेल जाने के बाद अब सबकी नजरें उनके बेटे और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर हैं। बता दें कि महागठबंधन की सरकार के दौरान तेजस्वी ने सरकार में रहते हुए भी अपनी अलग छवि बनाई थी और नीतिश के अलग होने के बाद विपक्ष में अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई है, लेकिन राजनीतिक मोर्चे पर अपने पिता लालू  यादव की तुलना में वे कितना परिपक्व है, इसकी असली परीक्षा अब होगी।