अभाविप के शिल्पकार केलकर, जिनकी प्रेरणा से कार्यकर्ता राष्ट्र के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर रहते हैं

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अगर आप अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के कार्यकर्ता हैं, रहे हैं या फिर इसके बारे में थोड़ा बहुत भी जानते हैं तो प्रा. यशवंत राव केलकर जी का नाम जरूर सुने होगें । केलकर जी के बारे में बताना सूर्य को दीया दिखाने के बराबर है । यूं तो अभाविप का कार्य 1948 से शुरू हो गया था जिसका विधिवत पंजीयन 9 जुलाई 1949 को हुआ । आप जानते हैं कि किसी भी मकान की  सुंदरता और भव्यता में शिल्पकारों की महत्ती भूमिका होती है । यह संयोग ही है जिस वर्ष डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य की शुरूआत कर रहे थे ठीक उसी वर्ष 25 अप्रैल 1925 को मां भारती के अनुपम लाल यशवंत केलकर जी का जन्म हुआ । कौन जानता था कि समान्य परिवार में जन्म लेने वाला यह बालक आगे चलकर अभाविप की शिल्पकारी करेगा, जग में भारत की विद्वता को प्रसारित करेगा, समरसता को जीवन का ऑक्सीजन बना लेगा ।

1945 में दशवीं कक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद ही उनके मन में राष्ट्र सेवा का बीजांकुर होना प्रारंभ हो गया था, 1945 में स्नातक की उपाधि लेने के साथ ही वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक के लिए प्रचारक बन गये । 1945 से 47 तक महाराष्ट्र के नाशिक नगर का नगर प्रचारक का दायित्व निभाया फिर जीवन में कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा । आजीवन मां भारती की सेवा में लगे रहे । उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि कार्य के दौरान भी उन्होंने अपने अध्ययन को नहीं छोड़ा परिणामस्वरूप 1955 में अग्रेंजी से परास्नातक ( एमए ) की उपाधि ली । उसके बाद मुंबई के के. सी. कॉलेज उसके बाद नेशनल कॉलेज में अध्यापन भी किया ।  1958 के आते – आते वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् में सक्रिय हो गये और अभाविप की शिल्पकारी में लग गये । बहुत कम ही समय में उन्होंने कार्यकर्ताओं की लंबी श्रृंखला तैयार कर दी जो देश के लिए मर मिटने के लिए तैयार थे ।  न केवल संख्यात्मक अपितु रचनात्मक दृष्टिकोण से भी परिषद् काफी मजबूत होने लगा था । सन 1960 की बात है जब उन्हें अभाविप के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का दायित्व दिया गया । 1967  – 68 के दौरान वे राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे ।

1967 में भारतीय एकात्मता और बंधुत्व की भाव लिए अभिनव प्रकल्प का प्रयोग किया गया, जिसका नाम था अंतर राज्य छात्र जीवन दर्शन (SEIL) । सील का उद्देश्य पूर्वोत्तर के युवाओ/छात्राओं को देश के अन्य भागों का दर्शन करवाना और परिवारों के साथ आत्मीय संबंध स्थापित किया जाय इसके साथ ही देश के अन्य भागों में रहने वाले छात्रों को ईश्वर के उपहार यानी पूर्वोत्तर की खुबसूरती से परिचित करवाना था । 1967 में एकात्मकता का जो बीज डाला गया था वह आज विशाल वटवृक्ष का रूप ले चुका जिसके छांव में पूरा भारत प्रफुल्लित  है, कभी हिंसा और अलगाववाद की अग्नि में जलते रहने वाला पूर्वोत्तर, आज पूरे भारत के साथ कंधे से कंधे मिलाकर भारत के विकास की सहभागी बन रहा । इस अभिनव प्रकल्प का प्रा. केलकर न केवल साक्षी रहे अपितु इसके संस्थापक अध्यक्ष रहकर इसे सजाया और संवारा भी  …….।

सत्तर के दशक में भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं की ज्वाला भड़क गई, युवाओं का आक्रोश तत्कालीन सरकार को नागवार गुजरा और आपातकाल लगा दिया । युवाओं का संगठन और उस संगठन के जिम्मेवार अभिभावक होने के चलते प्रा. केलकर की भूमिका को सहज अनुमान लगाया जा सकता है । केलकर जी को 1975 – 77 तक मीसा के तहत जेल में डाल दिया गया, जेल से निकलने के बाद भी वे युवाओं के व्यक्तित्व विकास में लगे रहे । 1981 में विद्यार्थी निधि, जो समाज के लिए काम करती है, का अध्यक्ष बने । केलकर जी से जुड़ी अनेक स्मृतियां है, जिससे कार्यकर्ता प्रेरणा लेकर राष्ट्रीय पुनर्निर्माण यज्ञ में समय – समय पर आहुति देते रहते हैं । 07 दिसंबर 1987 को उन्होंने अपने पार्थिक शरीर को त्यागकर परलोक सिधार गये और कार्यकर्ताओं को राष्ट्र के लिए जीने – मरने का संदेश दे गये । सात दिसंबर   अभाविप के कार्यकर्ताओं के लिए सबसे अविश्वसनीय था , प्रा. केलकर जी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी दी हुई सीख और संस्कार परिषद् के प्रत्येक कार्यकर्ताओं में सदैव विद्यमान है ।

!! हे महामानव आपको शत् – शत् नमन ! !

(लेखक अभाविप के मुखपत्र राष्ट्रीय छात्रशक्ति पत्रिका के सहायक संपादक हैं । )

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